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जळगाव (महाराष्ट्र) / पाचोरा | विशेष संवाददाता महाराष्ट्र के जळगाव जिले के पाचोरा रेलवे स्टेशन पर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के नाम पर विभिन्न प्रवेश मार्गों को बंद किए जाने के बाद एक गंभीर मानवीय समस्या सामने आ गई है। रेलवे प्रशासन द्वारा उठाए गए इस कदम को सुरक्षा की दृष्टि से उचित माना जा सकता है, लेकिन इससे बुजुर्गों, दिव्यांगों, गंभीर रूप से बीमार यात्रियों तथा शारीरिक रूप से कमजोर लोगों के सामने रोजाना नई मुश्किलें खड़ी हो रही हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि सुरक्षा व्यवस्था लागू करना आवश्यक है, लेकिन यदि उसके कारण जरूरतमंद लोगों की आवाजाही ही कठिन हो जाए तो व्यवस्था की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। जानकारी के अनुसार, महाराष्ट्र के जळगाव जिले के पाचोरा शहर स्थित रेलवे स्टेशन पर भूमिगत पुल के समीप स्थित मार्ग को लोहे का गेट लगाकर बंद कर दिया गया है। इसके अलावा गिरड रोड की ओर से स्टेशन तक पहुंचने वाला रास्ता भी बंद कर दिया गया है। इतना ही नहीं, RPF मुख्य कार्यालय की तरफ से आने-जाने का मार्ग भी अवरुद्ध कर दिया गया है। परिणामस्वरूप अब यात्रियों को स्टेशन तक पहुंचने के लिए केवल सीढ़ियों का ही सहारा लेना पड़ रहा है। युवा और स्वस्थ व्यक्तियों के लिए यह सामान्य स्थिति हो सकती है, लेकिन बुजुर्गों, दिव्यांगों और मरीजों के लिए यह किसी बड़ी परीक्षा से कम नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब रेलवे प्रशासन ने एक-एक करके सभी वैकल्पिक मार्ग बंद कर दिए, तब क्या उसने उन लोगों के बारे में भी सोचा जो सीढ़ियां चढ़ने में असमर्थ हैं? जिनके घुटनों में दर्द है, जो हृदय रोग से पीड़ित हैं, जिन्हें सांस संबंधी समस्याएं हैं, जो व्हीलचेयर पर निर्भर हैं या हाल ही में किसी गंभीर बीमारी अथवा शल्य चिकित्सा से उबरे हैं, उनके लिए स्टेशन तक पहुंचने की क्या व्यवस्था की गई? यह प्रश्न आज नागरिकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। विकास और आधुनिक सुविधाओं के दौर में देश के अनेक रेलवे स्टेशनों पर एस्केलेटर, लिफ्ट, रैंप तथा दिव्यांग-अनुकूल सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। केंद्र सरकार और भारतीय रेल लगातार यात्रियों को बेहतर सुविधाएं देने के दावे कर रहे हैं। ऐसे समय में महाराष्ट्र के जळगाव जिले के पाचोरा जैसे महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन पर इन बुनियादी सुविधाओं का अभाव स्थानीय लोगों को खटक रहा है। नागरिकों का कहना है कि यदि सभी रास्ते बंद किए जा रहे हैं तो कम से कम बुजुर्गों और दिव्यांग यात्रियों के लिए लिफ्ट, एस्केलेटर या विशेष प्रवेश व्यवस्था उपलब्ध कराई जानी चाहिए थी। यह मुद्दा केवल सुविधा का नहीं बल्कि समान अधिकार और मानवीय गरिमा का भी है। रेलवे स्टेशन किसी विशेष वर्ग के लिए नहीं बल्कि समाज के हर व्यक्ति के लिए बनाए जाते हैं। ऐसे में यदि कोई बुजुर्ग व्यक्ति केवल सीढ़ियां न चढ़ पाने के कारण ट्रेन तक नहीं पहुंच पाता, या कोई दिव्यांग यात्री स्टेशन तक पहुंचने में असहाय महसूस करता है, तो यह व्यवस्था की गंभीर कमी मानी जाएगी। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि जब तक स्थायी रूप से लिफ्ट या एस्केलेटर की व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक रेलवे प्रशासन को अस्थायी समाधान लागू करना चाहिए। बुजुर्गों, दिव्यांगों और मरीजों के लिए नियंत्रित एवं सुरक्षित विशेष प्रवेश मार्ग शुरू किया जा सकता है। जरूरतमंद यात्रियों के लिए रेलवे कर्मचारियों की सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है। इससे सुरक्षा व्यवस्था भी प्रभावित नहीं होगी और मानवीय दृष्टिकोण भी कायम रहेगा। इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि विकास केवल संरचनाएं खड़ी करने का नाम नहीं है, बल्कि आम नागरिकों की जरूरतों को समझने और उनके अनुरूप व्यवस्था बनाने का भी नाम है। सुरक्षा व्यवस्था जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण संवेदनशीलता भी है। यदि किसी व्यवस्था में सबसे कमजोर और जरूरतमंद व्यक्ति की सुविधा का ध्यान नहीं रखा जाता, तो वह व्यवस्था अधूरी मानी जाती है। अब समय आ गया है कि केंद्र और राज्य सरकार के जनप्रतिनिधि, सत्ताधारी दलों के पदाधिकारी, विपक्षी दलों के प्रतिनिधि, यात्री संगठन तथा सामाजिक कार्यकर्ता इस मुद्दे को गंभीरता से उठाएं। महाराष्ट्र के जळगाव जिले के पाचोरा रेलवे स्टेशन पर बुजुर्गों, दिव्यांगों और मरीजों के सामने खड़ी हुई इस समस्या का समाधान केवल मांगों और आश्वासनों से नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई से ही संभव है। सुरक्षा और सुविधा के बीच संतुलन स्थापित करना ही सुशासन की पहचान है। महाराष्ट्र के जळगाव जिले का पाचोरा रेलवे स्टेशन उत्तर महाराष्ट्र और खानदेश क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण रेलवे केंद्र है। ऐसे में यहां की समस्याओं का समय पर समाधान होना आवश्यक है। पूरे क्षेत्र की निगाहें अब रेलवे प्रशासन और जनप्रतिनिधियों पर टिकी हैं कि वे इस महत्वपूर्ण मुद्दे का समाधान कब और किस रूप में करते हैं।





























