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पाचोरा -भारत भुमी श्रद्धा, संस्कृति और सनातन परंपराओं का खजाना है। जन्म से मृत्यु तक मानव जीवन अनेक कर्मकांडों से जुड़ा हुआ होता है। उसमें ‘श्राद्ध विधि’ का विशेष महत्व है। कई लोगों ने गया यानी बिहार के प्रसिद्ध पितृश्राद्ध तीर्थ के बारे में सुना होगा। लेकिन माता के लिए, यानी मातृश्राद्ध के लिए भारतवर्ष में जो स्थान सर्वोत्तम और एकमात्र माना जाता है, वह है गुजरात का सिद्धपुर। इस स्थान को ‘मातृगया’ के नाम से भी जाना जाता है। गुजरात राज्य के पाटण जिले में स्थित

सिद्धपुर धार्मिक, पौराणिक और भावनात्मक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां मातृश्राद्ध अर्थात् मां की आत्मा की शांति के लिए विशेष विधि की जाती है। यह अनुभव केवल श्रद्धा का नहीं, बल्कि हृदय की कृतज्ञता का होता है। सिद्धपुर का पौराणिक महत्व अद्वितीय है। त्रिदेवों में से ब्रह्मदेव का एकमात्र प्राचीन मंदिर यहीं पर था, जो आज भी उस काल की ऐतिहासिक साक्ष देता है। यहां का बिंदु सरोवर भी ब्रह्माजी के आंसुओं से उत्पन्न हुआ ऐसा माना जाता है। इसीलिए यह तीर्थक्षेत्र विशिष्ट माना गया है। सिद्धपुर वह स्थान है जहाँ तप, श्राद्ध, स्नान और आत्मशांति एक साथ होते हैं। जहाँ केवल विधि नहीं, बल्कि हृदय से कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। गया में पितृश्राद्ध होता है, यह हम सभी ने सुना है। लेकिन माता का श्राद्ध अर्थात् मातृश्राद्ध केवल सिद्धपुर में करने से ही उसका पूर्ण फल मिलता है, ऐसी दृढ़ श्रद्धा है। हम अक्सर पिता के ऋण की स्मृति करते हैं, परंतु मां का ऋण, जो जन्मदात्री के रूप में होता है, वह बहुत ही गहरा और भावनात्मक होता है। ऐसी माता के लिए, उनकी आत्मा की शांति हेतु की जाने वाली विधि ही है सिद्धपुर की मातृगया श्राद्ध। स्कंद पुराण और वायु पुराण में इस स्थान का उल्लेख ‘मातृगया’ के रूप में स्पष्ट रूप से किया गया है। सिद्धपुर में श्राद्ध विधि करने की एक विशेष विधि है। यह विधि पूर्णतः विधिपूर्वक, शास्त्रोक्त और सम्पूर्ण तरीके से केवल दिंडोरी प्रणीत श्री स्वामी समर्थ केंद्र द्वारा और प.पू. गुरुमाऊली के आशीर्वाद से, प.पू. चंद्रकांतदादा के मार्गदर्शन में संपन्न होती है। यहाँ पं. महेंद्र भाई और हितेशभाई पंड्या (मो. 9825561729, 9825504407) पिछले तीस वर्षों से अनुभवी और श्रद्धा से मार्गदर्शन करने वाले पंडित हैं। पालनपुर रेलवे स्टेशन से मात्र 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बिंदु सरोवर के पास यह संपूर्ण विधि की जाती है। विशेष बात यह है कि केवल ₹500 की नाममात्र राशि में नीचे दी गई विधियाँ अत्यंत भावनापूर्वक संपन्न की जाती हैं: 1. त्रिपिंडी श्राद्ध 2. मातृगया पिंडदान 3. स्नान और तर्पण 4. भोजन इन सभी विधियों में लगभग 6 घंटे का समय लगता है। विशेष रूप से, महेंद्रभाई और हितेशभाई पंड्या के यहां इस विधि को करते समय कोई भी शॉर्टकट या व्यवसायिक प्रवृत्ति नहीं होती। प्रत्येक विधि अत्यंत भावुकता, पूर्ण श्रद्धा और शास्त्रोक्त मंत्रोच्चार के साथ संपन्न होती है। इससे पहले मैंने त्र्यंबकेश्वर में शिखरे गुरुजी के पास नारायण नागबली विधि का अनुभव लिया था। तब भी स्वामी समर्थ केंद्र के प्रयास से वह विधि अत्यंत पारदर्शी और संतोषजनक रूप से पूर्ण हुई। यहां भी वही संतोष और और अधिक श्रद्धा का अनुभव हुआ। विशेष रूप से बिंदु सरोवर के आसपास घूमते समय जब अन्य स्थानों पर चल रही विधियों का निरीक्षण किया, तब श्रद्धालुओं से अधिक जानकारी प्राप्त करने पर यह ज्ञात हुआ कि सिद्धपुर के कई स्थानों पर भारी आर्थिक लूट और बहुत कम समय में विधि पूरी करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। उसकी तुलना में स्वामी समर्थ केंद्र द्वारा की गई विधि में कहीं कोई छल-कपट या आर्थिक शोषण नहीं था। यह केवल एक धार्मिक विधि नहीं थी, बल्कि यह हृदय, कृतज्ञता और भावना की अभिव्यक्ति थी। हमारी मां हमारे लिए जो कुछ करती है, उस ऋण का यह एक आध्यात्मिक उत्तर होता है। सिद्धपुर का यह अनुभव केवल एक विधि भर नहीं रहता, बल्कि वह जीवनभर स्मरण में रहता है। स्वामी समर्थ केंद्र द्वारा संपन्न होने वाली यह विधियाँ किसी भी प्रकार की व्यावसायिकता से मुक्त होती हैं, यही उसकी विशेषता है। आज के युग में, जहां श्रद्धा को भी व्यापार बना दिया गया है, वहाँ ऐसे केंद्रों के माध्यम से संपन्न होने वाली विधियाँ ही सच्ची आध्यात्मिकता का परिचय देती हैं। अंत में एक भावनात्मक विचार: “पिता का ऋण गया में चुकाया जा सकता है, लेकिन मां के ऋण का पूर्ण प्रायश्चित्त केवल सिद्धपुर में ही संभव है।” हर किसी को कम से कम एक बार सिद्धपुर में मातृश्राद्ध करना चाहिए। यह केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानव संस्कृति की ऋण परंपरा का आदर करने का एक विनम्र प्रयास है। स्वामी समर्थ केंद्र द्वारा प.पू. गुरुमाऊली के आशीर्वाद और चंद्रकांतदादा के मार्गदर्शन में पं. महेंद्र भाई, हितेश भाई पंड्या द्वारा संपन्न यह आध्यात्मिक उपक्रम केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि मातृत्व के ऋण की भावनात्मक प्रतिपूर्ति है। यह विधि हमारे जीवन में मां द्वारा किए गए त्याग, ममता और प्रेम की स्मृति दिलाने वाला एक पवित्र क्षण है। मां हमें जन्म देती है, बड़ा करती है, कभी थके बिना हमारे लिए जीती है। उसके इस अनंत प्रेम का ऋण हम केवल ऐसे श्रद्धा विधियों द्वारा ही थोड़ा-बहुत चुका सकते हैं। सिद्धपुर की मातृगया श्राद्ध उस अनमोल ऋण की भावनात्मक और आध्यात्मिक व्याख्या है। यहाँ जब हम अपनी मां की आत्मा के लिए पिंड अर्पण करते हैं, तब केवल मंत्र नहीं गूंजते, बल्कि हमारे अंतर्मन के आँसू भी उस जल में घुल जाते हैं। यह उपक्रम मन को छूने वाला, आत्मा को झकझोरने वाला और श्रद्धा से परिपूर्ण अनुभव देने वाला है। ऐसी पवित्र भूमि पर, पवित्र उद्देश्य से, पवित्र मन से की गई यह विधि हर किसी ने जीवन में कम से कम एक बार अनुभव करनी चाहिए, क्योंकि “मां जैसी कोई और देवी नहीं।” सिद्धपुर के बिंदु सरोवर से लौटने वाला हर श्रद्धालु केवल संतोष ही नहीं लेकर लौटता, बल्कि वह अपने जीवन में मां के अस्तित्व की फिर से गहरी अनुभूति करता है… और तभी उसके होंठों पर बस एक ही वाक्य होता है — “मातृदेवो भव” -संदीप दा महाजन, पाचोरा – 7385108510
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