त्याग, संयम और आत्मशुद्धि का दीप प्रज्वलित करने वाला पर्युषण पर्व : अंबे वडगांव की कु. वैष्णवी चोपड़ा (जैन) का प्रेरणादायी अन्नत्याग उपवास

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पाचोरा – दिनांक 21 अगस्त 2025 गुरुवार से श्वेतांबर और स्थानकवासी जैन बंधुओं का पावन पर्युषण पर्व बड़ी श्रद्धा, भक्तिभाव और निष्ठा के साथ प्रारंभ हुआ है। भारतीय संस्कृति के इतिहास में जैन धर्मियों का यह पर्व विशेष महत्व रखता है। क्योंकि इस पर्व का मुख्य आधार है त्याग, संयम और आत्मशुद्धि। आज के भौतिक प्रगति के युग में जहाँ मानवीय संबंध, आत्मीयता और भावनात्मक बंधन दूर होते जा रहे हैं, वहाँ जैन धर्म की यह सीख हमें हमेशा सावधान करती है – “सांसारिक सुख की दौड़ में आत्मिक शांति का विस्मरण न हो।” ‘पर्युषण’ शब्द का अर्थ ही है आत्मा के समीप रहना। इस समय जैन बंधु बाहरी संसार से मन हटाकर आत्मशुद्धि, अंतर्मुखता और संयम की ओर बढ़ते हैं। यह पर्व केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि मानवता का मार्ग दिखाने वाला पवित्र काल है। हमारे देश में अनेक धर्म और परंपराएँ हैं। अधिकांश धर्मों में पर्वकाल आते ही पूजा, आराधना, उत्सव, सुंदर वस्त्र, स्वादिष्ट भोजन और उल्लास का वातावरण दिखाई देता है। लेकिन जैन धर्म की परंपरा भिन्न है। उनके पर्व का समापन भोग से नहीं, त्याग से होता है। जैन आचार्यों ने पर्युषण पर्व के निमित्त से दशलक्षण धर्म बताए हैं। ये दस विचार मानवीय जीवन के आधार स्तंभ हैं – 1. उत्तम क्षमा – क्षमा माँगना और क्षमा देना। 2. उत्तम मार्दव – नम्रता और अहंकार का त्याग। 3. उत्तम आर्जव – सरलता और ईमानदारी। 4. उत्तम शौच – आंतरिक और बाह्य पवित्रता। 5. उत्तम सत्य – सत्य बोलना और सत्य आचरण। 6. उत्तम संयम – इंद्रियों का नियंत्रण। 7. उत्तम तप – आत्मशुद्धि के लिए कष्ट सहन करना। 8. उत्तम त्याग – आसक्ति का त्याग। 9. उत्तम आकिंचन्य – कुछ भी अपना नहीं मानना। 10. उत्तम ब्रह्मचर्य – शुद्ध आचरण और आत्मनिष्ठा। ये दस गुण मानव जीवन को सही दिशा देने वाले आध्यात्मिक मार्गदर्शक दीपस्तंभ हैं। आज के तकनीकप्रधान, तेज़ जीवन में मनुष्य अधिक से अधिक भोग और सुख की ओर भाग रहा है। लेकिन इस दौड़ में शांति, संतोष, प्रेम और आत्मीयता खोते जा रहे हैं। पर्युषण पर्व हमें स्मरण कराता है कि सच्ची उन्नति आत्मिक होती है। जैन धर्म का पर्व केवल बाहरी उत्सव नहीं, बल्कि आत्मिक साधना और अंतर्मुख यात्रा है। इसी पावन पर्व की पृष्ठभूमि में पाचोरा तालुका के अंबे वडगांव निवासी दिलीप चोपड़ा (जैन) की सुपुत्री कु. वैष्णवी चोपड़ा (जैन) ने समाज में प्रेरणादायी आदर्श प्रस्तुत किया है। दिनांक 20 अगस्त 2025 बुधवार से उन्होंने अन्नत्याग करके उपवास साधना प्रारंभ की है। अन्नत्याग केवल भोजन त्यागना नहीं, बल्कि इंद्रिय संयम, मानसिक दृढ़ता और आत्मिक उन्नति का संगम है। आज के युग में किसी युवती द्वारा ऐसी साधना करना निश्चित ही सराहनीय है। क्योंकि इस समय अधिकांश युवक-युवतियाँ भौतिक सुख की ओर दौड़ते हैं, लेकिन कु. वैष्णवी ने आत्मसाधना का मार्ग चुनकर समाज के सामने आदर्श रखा है। कु. वैष्णवी का यह उपवास अखंड सात दिनों का है। इस अवधि में उन्होंने अन्नत्याग के साथ प्रार्थना, ध्यान, स्वाध्याय और संयम का मार्ग अपनाया है। उपवास का अर्थ केवल भोजन त्यागना नहीं, बल्कि मन, वाणी और कर्म से संयमी रहना भी है। इस संपूर्ण साधना से वह केवल अपनी आत्मशुद्धि नहीं कर रही, बल्कि समाज को “आध्यात्मिक शक्ति कैसे प्राप्त होती है” इसका जीवंत उदाहरण प्रस्तुत कर रही हैं। कु. वैष्णवी का यह प्रेरणादायी उपवास दिनांक 27 अगस्त 2025 बुधवार को पाचोरा स्थित जैन स्थानकों में संपन्न होगा। इस दिन जैन बंधु बड़ी श्रद्धा से उपस्थित होकर उनकी साधना के साक्षी बनेंगे। समापन समारोह में सामूहिक प्रार्थना, सामूहिक आराधना और आत्मिक संदेश का वातावरण रहेगा। कु. वैष्णवी चोपड़ा (जैन) के इस उपवास से युवा पीढ़ी को संयम, त्याग और आत्मशुद्धि का महत्व ज्ञात होगा। आज के समय में जहाँ भोजन की बर्बादी, अति-भोगवाद और विलासी जीवनशैली बढ़ रही है, वहाँ एक युवती द्वारा किया गया अन्नत्याग समाज को कृतज्ञता, संतोष और संयम का पाठ पढ़ाने वाला सिद्ध होता है। जैन धर्म का संदेश सभी के लिए जैन धर्म की शिक्षा केवल एक समाज तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवजाति के लिए मार्गदर्शक है। अहिंसा, दया, करुणा और संयम जैसे मूल्यों की आवश्यकता आज हर किसी को है। पर्युषण पर्व हमें यह याद दिलाता है कि – क्षमा माँगना और क्षमा देना जीवन का सबसे बड़ा पुण्य है। भौतिक प्रगति के साथ आत्मिक प्रगति भी उतनी ही आवश्यक है। त्याग के बिना सच्ची शांति और संतोष संभव नहीं। अंबे वडगांव की कु. वैष्णवी चोपड़ा (जैन) के अन्नत्याग उपवास से इस वर्ष के पर्युषण पर्व को विशेष आध्यात्मिक प्रकाश प्राप्त हुआ है। उनकी साधना केवल उनके परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे जैन समाज और वास्तव में समस्त समाज के लिए प्रेरणादायी सिद्ध होने वाली है। उनके त्यागमय मार्ग ने यह दिखा दिया है कि – “संयम में ही सच्ची शक्ति है, त्याग में ही सच्ची संपन्नता है और आत्मशुद्धि में ही सच्चा संतोष है।”

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