कश्मीर में हुए आतंकी हमले पर तीव्र प्रतिक्रिया : धर्म की आड़ में देश को तोड़ने की साजिश, लेकिन अब फैसला जनता को लेना होगा!

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हाल ही में कश्मीर घाटी में पर्यटकों पर हुआ आतंकी हमला न केवल एक कायराना कृत्य था, बल्कि भारत की अखंडता पर किया गया सुनियोजित प्रहार था। देश के विभिन्न राज्यों से आए निर्दोष पर्यटक, जो घूमने गए थे, उन पर अंधाधुंध गोलियां बरसाकर आतंकवादियों ने मानवता को शर्मसार कर दिया। इस घटना के बाद देशभर में केवल दुख और निंदा नहीं, बल्कि तीव्र और उग्र प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। सोशल मीडिया पर एक विशेष वाक्य आग की तरह फैल गया – “हमलावरों ने पहले धर्म पूछा, फिर गोलियां चलाईं।” यह वाक्य जितना चौंकाने वाला है, उतना ही सुनियोजित भी लगता है। यही वह वाक्य है जो आतंकवादियों और उनके प्रचारकों की मानसिक रणनीति को उजागर करता है – भारत में हिन्दू-मुस्लिम दंगों की चिंगारी भड़काने की साजिश।देश के कुछ कथित राष्ट्रभक्तों ने इस घटना का इस्तेमाल सीधे-सीधे पूरे मुस्लिम समाज को निशाना बनाने के लिए किया। सोशल मीडिया पर जहां सरकार और सुरक्षा पर सवाल उठाए जाने चाहिए थे, वहां “अगर AK-47 मिल जाए तो मुसलमानों को खत्म कर देंगे”, “इनकी दुकानों का बहिष्कार करो”, “इस धर्म के लोग ही देशद्रोही हैं” जैसी जहरीली भाषा का बोलबाला रहा। यह केवल भावनाओं का विस्फोट नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है, जो ठीक उसी तरह काम कर रही है जैसे आतंकवादी चाहते हैं।
हमलावरों ने धर्म पूछा या नहीं, इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि अब तक नहीं हुई है, लेकिन यह अफवाह लोगों के मन में ज़हर बनकर घुल गई है। और यही इन हमलों का असली मकसद है – भारत की सामाजिक एकता को भीतर से तोड़ना। आतंकवादियों को मालूम है कि एक गोली से 5 लोग मरेंगे, लेकिन एक अफवाह से 50 करोड़ दिलों में नफरत भर दी जा सकती है।और दुर्भाग्य की बात है कि, आजकल खुद को राष्ट्रभक्त कहने वाले ही इस ज़हर को सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा फैलाते हैं। उन्हें लगता है कि देशप्रेम का मतलब किसी एक धर्म को गाली देना है। लेकिन सच्चाई ये है – आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। उनकी जात, धर्म, वंश, पंथ सब ढके रहते हैं, क्योंकि उनका मकसद धर्म की रक्षा नहीं, बल्कि केवल और केवल विनाश होता है। उनकी पहचान सिर्फ एक होती है – आतंकी। और विडंबना ये है कि उनके हमलों में कई बार उन्हीं के धर्म के लोग मारे जाते हैं – लेकिन उस पर कोई बात नहीं करता।
आज सोशल मीडिया एक ऐसा हथियार बन गया है, जो बम और गोली से भी खतरनाक साबित हो रहा है। किसी भी हमले के बाद घटना की गंभीरता से ज़्यादा चर्चा होती है – पीड़ित का धर्म क्या था। और यही भारत को तोड़ने वाला सबसे घातक हथियार है – अंदर से सड़ांध पैदा करने वाला। सोशल मीडिया पर देशभक्ति की लहरें उठती हैं, लेकिन वही लोग चाइना की सस्ती चीजों के लिए कतार में खड़े दिखते हैं और फिर अगले दिन पाकिस्तान और भारत के मुस्लिमों के खिलाफ पोस्ट करते हैं।
आज चाइना की भूमिका पर कोई सवाल नहीं उठाता, जबकि सीमाओं पर हो रही घुसपैठ, आतंकियों को मिल रही तकनीकी सहायता, हथियारों की तस्करी और ड्रग्स नेटवर्क में चाइना की संदिग्ध भागीदारी को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है। क्योंकि हमारे बाज़ार और उपभोग की मानसिकता उसी चाइना की चीज़ों पर टिकी है। ऐसे में उनके खिलाफ आवाज़ उठाना अपने ही आराम को चुनौती देना हो जाता है।
अब सवाल सरकार और सुरक्षा एजेंसियों पर भी है – क्या केवल “शोक व्यक्त करना” ही पर्याप्त है? यह समय है साहसी निर्णयों का, कठोर कदमों का और गुप्तचर तंत्र की विफलताओं को खुलकर स्वीकार करने का। आज भारत में हजारों करोड़ रुपये खुफिया तंत्र पर खर्च हो रहे हैं, फिर भी हमलावर अगर धर्म पूछकर गोलियां चला सकते हैं, तो यह हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए शर्म की बात है। सिर्फ गोली चलाकर आतंकवाद का खात्मा नहीं होगा, बल्कि उसके विचारों, उसकी अफवाहों, और उसके ज़हरीले अजेंडे को जड़ से मिटाना होगा – और यह काम जनता ही कर सकती है। अब फैसला हमें लेना है – क्या हम आतंकवादियों की मानसिक साजिश के मोहरे बनेंगे, या विवेक, इंसानियत और एकता के रास्ते पर चलकर देश को अंदर से मजबूत करेंगे?
आतंकी केवल बारूद से नहीं बनते, वे हमारे समाज में फैले धर्मद्वेष से जन्म लेते हैं। जब हम कहते हैं “यह मुसलमान है”, तब हम अनजाने में आतंकवादियों को वैचारिक बल दे रहे होते हैं। आतंकवाद को हराना है तो केवल गोलियों से नहीं, बल्कि दिल और दिमाग जोड़ने से होगा। देश को आज ज़रूरत है – निर्भीक नागरिकों की, निष्पक्ष नेतृत्व की, और मानवता की सच्ची भावना रखने वाले समाज की।आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता – उनकी पहचान सिर्फ अमानवीयता होती है। अगर ये बात हर भारतीय के दिल में बैठ गई, तो कोई भी आतंकी संगठन भारत को हिला नहीं सकता। गोली की दिशा आतंकियों की ओर होनी चाहिए, लेकिन सोशल मीडिया की ज़ुबान देश के खिलाफ न चले – यही असली देशसेवा है, और यही असली लड़ाई।

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